Home > Uncategorized > कांग्रेस मजबूत नही है, कांग्रेस में जाट वोट बैंक मजबूत है

कांग्रेस मजबूत नही है, कांग्रेस में जाट वोट बैंक मजबूत है

कांग्रेस मजबूत नही है, कांग्रेस में जाट वोट बैंक मजबूत है जिसके भरोसे सत्ता प्राप्त की जा सकती है।

आजादी के बाद से ही जाट जाति कांग्रेस पार्टी से जुड़ी रही है फिर भी जिस तरह से जाट समाज का बीते कुछ वर्षों में कांग्रेस से मोह भंग हुआ है, उसके बाद कांग्रेस को दोगुनी ताकत से काम करना होगा, जो एक जमाने में परसराम मदेरणा, नाथूराम मिर्धा और शीशराम ओला किया करते थे।

इतिहास गवाह है, 1992 से पहले कांग्रेस के सामने मजबूत विपक्षी पार्टी नही थी, जिस कारण मर्जी आयी उस नेता को CM बना दिया। जब जाट पढ़े लिखे कम थे।

1992 से 1998 में पहली बार भाजपा मजबूत होकर सत्ता में आयी भैरोसिंह शेखावत CM रहे।
दो बार सत्ता से दूर रही तो काँग्रेस ने 1998 के चुनाव में जाट कार्ड खेलते हुए स्वर्गीय परसरामजी मदेरणा को CM का चेहरा बना कर चुनाव लड़ा, जाट समुदाय ने अन्य किसान कौमो को साथ लेकर एकतरफा मतदान किया परिणामस्वरूप कांग्रेस को भारी बहुमत मिला, लेकिन CM गहलोत को बनाया गया। जिससे नाराज होकर जाटो ने 2003 के चुनाव में कांग्रेस को घर बैठा दिया।
फिर 2008 के चुनाव में कांग्रेस ने पुनः जाट वोट की नब्ज टटोली लेकिन जाट चेहरा घोषित नही करने के कारण आधे अधूरे वोट मिले एवं कांग्रेस ने बसपा के 6 विधायक उधार लेकर सरकार बनाई फिर गहलोत CM बने, हालांकि कैबिनेट में जाटों का वर्चस्व रहा।

उसके बाद कांग्रेस की हालत नाजुक बनती गई, इधर हनुमान बेनीवाल के प्रदेश में बड़े जाट नेता के रूप में उभरने के साथ ही जाट CM की मांग ने ज्यादा जोर पकड़ लिया है। जाट मतदाता शांत रहकर अपना हक हासिल करना चाहता है। वर्तमान में जाट समुदाय को जंहा भी नेतृत्व की जरूरत पड़ी सिर्फ हनुमान बेनीवाल ने ही उनका साथ दिया है। जाट युवा वर्ग के साथ साथ 36 कौम के युवा बेनीवाल के दीवाने होकर चल रहे है, उनके इशारे पर काम करने लगे है।

अब ऐसी परिस्थितियों में कांग्रेस को यदि पुनः अपने सबसे बड़े वोट बैंक को एकतरफा करना है तो जाट नेता को CM उम्मीदवार घोषित करना ही होगा, नही तो anti incumbancy के भरोशे सत्ता प्राप्ति असम्भव है। साथ ही मोदी लहर का प्रभाव पूरी तरह से खत्म नही हुआ है।

1998 एव 2008 के चुनाव में दो बार अपनी पार्टी से धोखा खाने के बाद जाट समुदाय अब किसी भी तरह कांग्रेस के धोखे में नही आने वाला है क्योंकि अब कौम पूरी तरह जागरूक एव शिक्षित हो चुकी है।
लोग कुछ भी कहे, लेकिन जाटो के बिना कांग्रेस आज एक रैली करवाने की स्तिथि में नही है।

भले ही प्रदेश में एन्टी इंकम्बैंसी हो लेकिन उससे बहुमत मिलना नही है।

ऐसे में इतना तय है कि राज्य में यदि किसी को राज करना है तो जाट समाज और जाट समाज की राजनीति को प्रभावित करने वाले सियासी कारणों को साथ लिए बगैर बहुमत हासिल नहीं कर सकता। सबसे बड़ी आबादी होने के साथ ही जाट सियासत अब पढ़—लिख चुकी है। एक मोटा अनुमान है कि केवल मोदी फैक्टर को छोड़ दें तो आज भी राज्य की राजनीति में जाट वोट बैंक ही सत्ता का फैसला करता है। फिर चाहे राज्य में ‘180 प्लस’ का लक्ष्य हो या देश में ‘480 प्लस’ का टारगेट, कुछ भी इस सबसे बड़े कृषक समुदाय को साथ लिए बिना आसान नहीं होगा।

कांग्रेस का जनाधार कम हुआ है तो वो दो बार जाट समुदाय को धोखा देने की वजह से हुआ है और अब यदि पुनः जनाधार हासिल होगा तो जाट चेहरे को सामने लाने पर ही होगा। क्योंकि माली जाति का कोई बड़ा वोट बैंक नही है उसमें भी आधा भाजपा प्रदेशाध्यक्ष का प्रभाव रहेगा। रही बात गुर्जरो की तो गुर्जर परम्परागत भाजपा का वोट बैंक है और आरक्षण को लेकर दो धड़ों में विभाजित है बराबर फायदा देगा दोनों पार्टियों को।
राजपूत भाजपा से कुछ प्रकरणों को लेकर नाराज है लेकिन काँग्रेस के साथ नही है।

चौथी बड़ी कौम मीणा है जो चार पांच जिलों में प्रभाव रखती है वो वर्तमान में किरोड़ीलाल मीणा के साथ लगभग लामबंद है किरोड़ी भाजपा के साथ है।

ऐसे में कांग्रेस अगर 1 प्रतिशत भी राजस्थान में सत्ता हासिल करना चाहती है तो वह उसे जाट समुदाय के एक तरफा वोट लेने के लिए पायलट, गहलोत के कैरियर की चिंता किये बगैर जाट CM का चेहरा घोषित कर देना चाहिए।

फोजाराम खोत

Leave a Reply

Your email address will not be published.