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दुश्मन क्यों थर्राता है फौज के इन जांबाजों से, आप भी करेंगे सलाम

भारतीय सेना के वीर व जोशीले जवानों ने दुनिया को अपने साहस के लोहा मनवाया है। अंग्रेजी शासन काल में गठित भारतीय सेना कि कई बटालियनों की पहचान उनके अदम्य साहस हैं। ऐसी ही 5 रेजिमेंटों के जवान जिनसे दुश्मन कांपता है।

जीत का प्रतीक ये रेजिमेंट
गोरखा रेजीमेंट, सिख रेजिमेंट. पंजाब रेजीमेंट, कुमाऊं रेजीमेंट और जाट रेजीमेंट के जवानों ने वीरता, बहादुरी और जीत का अमर इतिहास रचा है।

200 साल से खतरनाक सिख रेजीमेंट
सिख रेजीमेंट भारतीय सेना की सबसे खतरनाक सेना है। इस रेजीमेंट को 72 लड़ाई ऑनर्स, 15 रंगमंच ऑनर्स, 2 परमवीर चक्र, 14 महावीर चक्र, 5 कीर्ति चक्र, 67 वीर चक्र और 1,596 अन्य वीरता पुरुस्‍कार मिले हैं। अद्वितीय कहानियों से जुड़ी इस रेजीमेंट की पहली बटालियन अंग्रेजों ने 1846 में सिख साम्राज्य के विलय से पहले बनाई थी। सिख रेजीमेंट में 19 बटालियन हैं, जो ‘निश्चय कर अपनी जीत करों’ के नारे के साथ आगे बढ़ते हैं।

दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध मैदान में तैनात
सन् 1813 में स्थापित कुमाऊं रेजीमेंट अब तक 2 परम वीर चक्र, 4 अशोक चक्र, 10 महावीर चक्र, 6 कीर्ति चक्र समेत तमाम पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। कुमाऊं रेजीमेंट ने तमाम युद्धों में अपना जौहर दिखाया है। सबसे विेशेष यह कि कुमाऊं रेजीमेंट दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध के मैदान सियाचिन ग्लेशियर में भी तैनात है।

लोंगोवाला का युद्ध किसने जीता
भारत की सबसे पुरानी रेजिमेंटों में से एक पंजाब रेजीमेंट की जीत का ढंका आज भी बजता है। ‘जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल’ और ‘बोल ज्वाला माता की जय’ का युद्ध घोष करने वाली इस रेजीमेंट का बंटवारा भी भारत-पाक बंटवारे के साथ हुआ था। पहला हिस्सा पाकिस्तान को और दूसरी बटालियन भारत को मिली थी। लोगेंवाला की लड़ाई में पंजाब रेजीमेंट का जौहर हम सभी देख चुके हैं। पाकिस्तानी सेना को ऐसी धूल चटाई जो आज भी एक इतिहास है।

सबसे पुरानी, सबसे अधिक वीरता पुरस्कार
सन् 1795 में स्थापित जाट रेजीमेंट भारतीय सेना की एक पैदल सेना रेजीमेंट है। इसकी वीरता का प्रेरमाण यह कि इसके बहादुरों ने वर्ष 1839-1947 के बीच 19 और स्वंत्रता के बाद 8 महावीर चक्र, 8 कीर्ति चक्र, 32 शौर्य चक्र, 39 वीर चक्र और 170 सेना पदक जीते हैं। रेजीमेंट के जवानों ने पहले और दूसरे विश्व युद्ध सहित भारत और विदेशों में अनेक युद्धों में भाग लिया है।

मौत से डरता नहीं गोरखा
गोरखा रेजीमेंट को जवानों के बारे में कहा जाता है कि वे मौत का पीछा करते हैं। अग्नेयास्त्र न होने पर ये रण छोड़ कर भागते नहीं, बल्कि अपनी 12 इंची खुखरी से दुश्मन का सिर कलम करने के लिए उनका पीछा करते हैं और विजयी होते हैं। उनका नारा भी है ‘कायरता से मरना अच्छा’ और उनका जयघोष ‘जय महा काली, आयो गोरखाली’ सुन दुश्मन भी जान जाता है कि खुखरी से उनकी गर्दन कटेगी ही कटेगी।

स्रोत- रामप्रकाश तिरपाठी